लूट मची धरो ध्यान: एक काव्य भारत के नाम!
लूट मची रे… लूट मची!
(ब्रज-अवधी काव्य)
लूट मची रे लूट मची, जागत नाहीं कोय।
रामराज्य की बात करत, धूर्तन राज न होय॥
नमो! नमो! मुख गावत हैं, पर लूटत नगर-ग्राम।
धर्म भयो व्यापार यहाँ, कहाँ मिलें अब राम?॥
संतन को अब कौन सुने, साधुन की गति हीन।
माया के मद पियत सभी, सत्य भयो प्रवीण॥
राजनीति कौ खेल भयो, धर्म भयो बाजार।
झूठन की जय-जय हुई, साँच करे लाचार॥
सांच कहै तो बंधि परै, झूठन पावै मान।
नीति बनी व्यापार की, करम भए वीरान॥
जनता रोवत देखत है, कब आवै कोउ धीर?
राम-कृष्ण की भूमि में, फिर कौन बनै धीरवीर?॥
लूट मची रे लूट मची, भारत देश महान।
फिर से जागो, फिर से कहो – जय सनातन ज्ञान॥
🌿 ⚕आचार्या मयूर शर्मा⚕ 🌿

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